यूपी में किन्नरों पर दांव लगाने की सियासत नहीं है नई

यूपी की सियासत में किन्नरों की अलग पहचान रही है. हाल ही यूपी की प्रयागराज (इलाहाबाद) लोकसभा सीट से आम आदमी पार्टी ने किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर भवानी नाथ बाल्मीकि (भवानी मां) को टिकट देने की घोषणा की है. इसके अलावा कुछ दिन पहले किन्नर गुलशन बिंदू ने सपा छोड़कर कांग्रेस जॉइन की है. उन्होंने प्रियंका गांधी के लिए एक जनसभा का भी आयोजन किया था. ऐसे ही कई किन्नर हैं जो अब तक यूपी की राजनीति में अपनी किस्मत अपना चुके हैं.

भवानी मां प्रयागराज से ठोकेंगी ताल

भवानी मां कुंभ के दौरान चर्चा में आईं क्योंकि हाल ही में संपन्न हुए कुंभ में पहली बार किन्नर अखाड़े को भी जगह मिली थी. वह, किन्नर अखाड़ा आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी के बाद दूसरे स्थान पर आती हैं. 17 नवंबर 1972 को दिल्ली के चाणक्यपुरी में जन्मीं भवानी नाथ को 13 साल की उम्र में पता चला था कि वह किन्नर हैं.





 उन्होंने काफी कम उम्र में अपने पिता का घर छोड़ दिया था. उन्होंने 2010 में हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाया था. वह 2012 में हज यात्रा भी कर चुकी हैं. हालांकि पांच साल बाद उन्होंने दोबारा हिंदू धर्म अपना लिया. 2016 में अखिल भारतीय हिंदू महासभा के किन्नर अखाड़े में धर्मगुरू बनी थीं. उन्हें स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने 2017 में महामंडलेश्वर की उपाधि दी. अब वह आम आदमी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ेंगी.


प्रियंका से प्रभावित होकर कांग्रेस में आईं गुलशन

हाल ही में कांग्रेस में शामिल हुईं किन्नर गुलशन बिंदू अयोध्या (फैजाबाद) में काफी मशहूर हैं. साल 2012 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय के तौर पर गुलशन ने 20 हजार वोट हासिल किए थे. वह ये चुनाव तो नहीं जीत पाईं, लेकिन भाजपा प्रत्याशी लल्लू सिंह की हार का कारण बनीं. फिर गुलशन नगर पालिका परिषद चेयरमैन का चुनाव लड़ीं और 200 वोटों से हारीं. 2017 में सपा ने मेयर प्रत्याशी बनाया. भाजपा प्रत्याशी ऋषिकेश उपाध्याय सिर्फ 35 सौ वोटों से जीते. उपाध्याय को 44628 वोट मिले, जबकि किन्नर गुलशन को 41,035 वोट मिले.
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आशा देवी बनीं थीं योगी के गढ़ में मेयर

यूपी की राजनीति में किन्नरों को आशा देवी की जीत से प्रेरणा मिलती है. दरअसल 2001 के नगर निगम चुनाव में गोरखपुर किन्नर आशा देवी उर्फ अमरनाथ को जी मिली थी. उस समय प्रदेश में भाजपा की सरकार थी और गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ सांसद थे. निर्दलीय आशा देवी ने सपा प्रत्याशी अंजू चौधरी को 60 हजार वोटों से पराजित किया. चुनाव में आशा देवी को 1.08 लाख वोट, सपा की अंजू चौधरी को 45 हजार और भाजपा की विद्यावती देवी को 13 हजार वोट मिले थे. इसके बाद से ही यूपी की राजनीति में किन्नर भी एक्टिव हो गए.


लाल जी टंडन के खिलाफ लड़ीं पायल


2002 के विधानसभा चुनाव यूपी से 18 किन्नरों ने अलग-अलग सीटों से नामांकन किया था. इनमें पायल सहित तीन किन्नर लखनऊ की अलग-अलग विधानसभाओं से प्रत्याशी थे. किन्नर पायल लखनऊ पश्चिम की उस सीट से मैदान में थी, जहां से भाजपा के धुरंधर नेता लालजी टंडन जीते थे. पायल अभी राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर अपने विचार खुलकर रखती हैं.




रायबरेली में चुनाव लड़ चुकी हैं किन्नर पूनम

राजनीति में रायबरेली की पहचान कांग्रेस के गढ़ के तौर पर है. साल 2017 में हुए रायबरेली नगर पालिका चुनाव में जन अधिकार पार्टी से किन्नर पूनम चुनाव लड़ चुकी हैं. इस दौरान पूनम ने नगर पालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई थी. वहीं निकाय चुनाव के दौरान ही मुरादाबाद में किन्नर मुमताज भी चुनाव लड़ चुके हैं.

शबनम मौसी बनीं थीं पहली विधायक


बता दें कि देश की पहली किन्नर विधायक मध्य प्रदेश विधानसभा के लिए 2000 में चुनी गईं. मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के सोहागपुर निर्वाचन क्षेत्र से वर्ष 2000 के उपचुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में शबनम मौसी ने जीत दर्ज की. वहीं 1994 में किन्नरों को मतदान का अधिकार मिला था. वहीं 2017 में थर्ड जेंडर की मान्यता मिली. यूपी में फिलहाल 8374 मतदाता हैं.

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