नेहरू खानदान को आज भी ब्राह्मणों के श्राप से शापित बताया एक बड़े नाम ने.. कौन है वो और कौन सा है वो शाप ?

क्या नेहरू-गांधी खानदान ब्राह्मणों के श्राप से शापित है? निश्चित रूप से आप सभी इस सवाल को सुनकर सोच में पड़ जायेंगे.. लेकिन एक लेखक हैं प्रेम शंकर मिश्रा..जिनका दवा है कि हाँ नेहरू-गांधी खानदान को ब्राह्मणों का श्राप लगा हुआ है. इस श्राप के पीछे की उन्होंने जो कहानी बताई है वो न सिर्फ चौकाने वाली है बल्कि उनके दावों को पूरी तरह से सच भी साबित करती है. उन्होंने बताया था कि स्वामी करपात्री जी महाराज ने इंदिरा गांधी को श्राप दिया था उनके परिवार के सदस्यों की मृत्यु गोपाष्टमी के दिन होगी. इसके बाद संजय, इंदिरा तथा राजीव तीनों की मृत्यु जिस दिन हुई उस दिन गोपाष्टमी थी.


बताया जाता है कि इंदिरा गांधी के लिये उस समय चुनाव जीतना बहुत मुश्किल था. धर्म धुरंधर स्वामी करपात्री जी महाराज के आशीर्वाद से इंदिरा गांधी चुनाव जीती. इंदिरा ग़ांधी ने उनसे वादा किया था चुनाव जीतने के बाद गाय के सारे कत्ल खाने बंद हो जायेगें जो अंग्रेजो के समय से चल रहे थे. लेकिन इंदिरा गांधी मुस्लिम कट्टरपंथियों और कम्यूनिस्टों के दवाब में आकर अपने वादे से मुकर गयी. तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा ने संतों इस मांग को ठुकरा दिया जिसमें सविधान में संशोधन करके देश में गौ वंश की हत्या पर पाबन्दी लगाने की मांग की गयी थी.




स्वामी करपात्री महाराज को लगा था कि इंदिरा गांधी मेरी बात अवश्य मानेंगी. उन्होंने एक दिन इंदिरा गांधी को याद दिलाया कि आपने वादा किया था कि संसद में गोहत्या पर आप कानून लाएंगी. लेकिन कई दिनों तक इंदिरा गांधी उनकी इस बात को टालती रहीं. ऐसे में करपात्रीजी को आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा. 1965 में भारत के लाखों संतों ने गोहत्याबंदी और गोरक्षा पर कानून बनाने के लिए एक बहुत बड़ा आंदोलन चलाया गया था.

करपात्रीजी महाराज शंकराचार्य के समकक्ष देश के मान्य संत थे. करपात्री महाराज के शिष्यों अनुसार जब उनका धैर्य चुक गया तो उन्होंने कहा कि गोरक्षा तो होनी ही चाहिए. इस पर तो कानून बनना ही चाहिए. लाखों साधु-संतों ने उनके साथ कहा कि यदि सरकार गोरक्षा का कानून पारित करने का कोई ठोस आश्वासन नहीं देती है, तो हम संसद को चारों ओर से घेर लेंगे. फिर न तो कोई अंदर जा पाएगा और न बाहर आ पाएगा.
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संतों ने 7 नवंबर 1966 गोपाष्टमी को संसद भवन के सामने धरना शुरू कर दिया. इस धरने में मुख्य संतों के नाम इस प्रकार हैं- शंकराचार्य निरंजन देव तीर्थ, स्वामी करपात्रीजी महाराज और रामचन्द्र वीर. रामचन्द्र वीर तो आमरण अनशन पर बैठ गए थे. गोरक्षा महाभियान समिति के संचालक व सनातनी करपात्रीजी महाराज ने चांदनी चौक स्थित आर्य समाज मंदिर से अपना सत्याग्रह आरंभ किया. करपात्रीजी महाराज के नेतृत्व में जगन्नाथपुरी, ज्योतिष पीठ व द्वारका पीठ के शंकराचार्य, वल्लभ संप्रदाय की सातों पीठों के पीठाधिपति, रामानुज संप्रदाय, माधव संप्रदाय, रामानंदाचार्य, आर्य समाज, नाथ संप्रदाय, जैन, बौद्ध व सिख समाज के प्रतिनिधि, सिखों के निहंग व हजारों की संख्या में मौजूद नागा साधुओं को पं. लक्ष्मीनारायणजी चंदन तिलक लगाकर विदा कर रहे थे. लाल किला मैदान से आरंभ होकर नई सड़क व चावड़ी बाजार से होते हुए पटेल चौक के पास से संसद भवन पहुंचने के लिए इस विशाल जुलूस ने पैदल चलना आरंभ किया. रास्ते में अपने घरों से लोग फूलों की वर्षा कर रहे थे. हर गली फूलों का बिछौना बन गई थी.

कहते हैं कि नई दिल्ली का पूरा इलाका लोगों की भीड़ से भरा था. संसद गेट से लेकर चांदनी चौक तक सिर ही सिर दिखाई दे रहे थे. लाखों लोगों की भीड़ जुटी थी जिसमें महिलायें भी शामिल थी. हजारों संत थे और हजारों गोरक्षक थे. सभी संसद की ओर कूच कर रहे थे. कहते हैं कि दोपहर 1 बजे जुलूस संसद भवन पर पहुंच गया और संत समाज के संबोधन का सिलसिला शुरू हुआ. करीब 3 बजे का समय होगा, जब आर्य समाज के स्वामी रामेश्वरानंद भाषण देने के लिए खड़े हुए. स्वामी रामेश्वरानंद ने कहा कि यह सरकार बहरी है. यह गोहत्या को रोकने के लिए कोई भी ठोस कदम नहीं उठाएगी. इसे झकझोरना होगा तथा संसद से सांसदों को खींचकर लाना होगा.




कहा जाता है कि जब इंदिरा गांधी को यह सूचना मिली तो उन्होंने निहत्थे करपात्री महाराज और संतों पर गोली चलाने के आदेश दे दिए. पुलिसकर्मी पहले से ही लाठी-बंदूक के साथ तैनात थे. पुलिस ने लाठी और अश्रुगैस चलाना शुरू कर दिया. इतने में अंदर से गोली चलाने का आदेश हुआ और पुलिस ने संतों और गोरक्षकों की भीड़ पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी. संसद के सामने की पूरी सड़क खून से लाल हो गई. लोग मर रहे थे, एक-दूसरे के शरीर पर गिर रहे थे और पुलिस की गोलीबारी जारी थी. माना जाता है कि एक नहीं, उस गोलीकांड में सैकड़ों साधु और गोरक्षक मर गए. दिल्ली में कर्फ्यू लगा दिया गया. संचार माध्यमों को सेंसर कर दिया गया और हजारों संतों को तिहाड़ की जेल में ठूंस दिया गया.

इस हत्याकांड से क्षुब्ध होकर तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारीलाल नंदा ने अपना त्यागपत्र दे दिया और इस कांड के लिए खुद एवं सरकार को जिम्मेदार बताया. इधर, संत रामचन्द्र वीर अनशन पर डटे रहे, जो 166 दिनों के बाद समाप्त हुआ था जब अनशन के दौरान ही उनकी मृत्यु हो गई. यह दुनिया की पहली ऎसी घटना थी जिसमें एक हिन्दू सन्त ने गौ माता की रक्षा के लिए 166 दिनों तक भूखे-प्यासे रहकर अपना बलिदान दिया था. देश के इतने बड़े घटनाक्रम को किसी भी राष्ट्रीय अखबार ने छापने की हिम्मत नहीं दिखाई. यह खबर सिर्फ मासिक पत्रिका ‘आर्यावर्त’ और ‘केसरी’ में छपी थी. कुछ दिन बाद गोरखपुर से छपने वाली मासिक पत्रिका ‘कल्याण’ ने अपने गौ अंक विशेषांक में विस्तारपूर्वक इस घटना का वर्णन किया था.
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इस घटना के बाद स्वामी करपात्रीजी के शिष्य बताते हैं कि करपात्रीजी ने इंदिरा गांधी को श्राप दे दिया कि जिस तरह से इंदिरा गांधी ने संतों और गोरक्षकों पर अंधाधुंध गोलीबारी करवाकर मारा है, उनका भी हश्र यही होगा. कहते हैं कि संसद के सामने साधुओं की लाशें उठाते हुए करपात्री महाराज ने रोते हुए ये श्राप दिया था.

‘कल्याण’ के उसी अंक में इंदिरा को संबोधित करके कहा था- ‘यद्यपि तूने निर्दोष साधुओं की हत्या करवाई है फिर भी मुझे इसका दु:ख नहीं है, लेकिन तूने गौहत्यारों को गायों की हत्या करने की छूट देकर जो पाप किया है, वह क्षमा के योग्य नहीं है. इसलिए मैं आज तुझे श्राप देता हूं कि ‘गोपाष्टमी’ के दिन ही तेरे वंश का नाश होगा. आज मैं कहे देता हूं कि गोपाष्टमी के दिन ही तेरे वंश का भी नाश होगा.’ जब करपात्रीजी ने यह श्राप दिया था तो वहां प्रमुख संत ‘प्रभुदत्त ब्रह्मचारी’ भी मौजूद थे. कहते हैं कि इस कांड के बाद स्वामी करपात्रीजी अवसाद में चले गए थे.




स्वामी करपात्री जी ने जो भी कहा था वह आगे चल कर अक्षरशः सत्य भी हुआ. अबतक इंदिरा का वंश गोपाष्टमी के दिन ही नाश को प्राप्त होता रहा है. सबूत के लिए इन मौतों की तिथियों पर ध्यान दीजिये. 1-संजय गांधी की मौत आकाश में हुई थी, उस दिन हमारे पंचांग के अनुसार “गोपाष्टमी” थी. 2-इंदिरा की मौत घर में हुई थी, उस दिन भी “गोपाष्टमी” थी. 3-राजीव गांधी की जिस दिन हत्या हुई उस दिन भी “गोपाष्टमी” ही थी.

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