लाल कृष्ण आडवाणी: जिनके पीछे चलता था नेताओं का काफिला, अब 50 गज दूर से भाग जाते हैं नेता


भारतीय जनता पार्टी आज जिस सर्वोच्च स्थान पर है उस स्थान पर इस पार्टी को पहुंचाने में हज़ारों लाखों कार्यकर्ताओं की मेहनत शामिल है. लेकिन इन सब के बीच दो नाम जो सबसे महत्वपूर्ण हैं वो हैं अटल बिहारी वाजपेयी और पार्टी के ‘आयरन मैन’ कहे जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी. हर बार के लोकसभा चुनाव की तरह इस बार भी चुनाव का अहम मुद्दा राम मंदिर के इर्द-गिर्द ही घूम रहा है
 अदालत ने इस मामले को सुलझाने के लिए मध्यस्थों की एक टीम भी गठित कर दी है…लेकिन यह पहली बार नहीं है जब मंदिर मस्जिद विवाद को सुलझाने के लिए इस तरह की बात की गई हो. वीपी सिंह जब प्रधानमंत्री थे तब भी मध्यस्थों के ज़रिए इस मामले को सुलझाने के प्रयास किए गए थे. बस फर्क इतना था कि उस समय मोदी और शाह की जोड़ी नहीं आडवाणी और वाजपेयी की जोड़ी हुआ करती थी.




आज से करीब 30 साल पहले वह आडवाणी ही थे जिन्होंने न केवल भाजपा को बल्कि देश को एक नया मुद्दा दिया था…91 साल के हो चुके आडवाणी को ‘पीएम इन वेटिंग’ कहा जाता है. पार्टी में आज उनकी स्थिति किसी से छुपी नहीं है..लेकिन ‘यदा यदा हि योगी’ में वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी ने आडवाणी के उन पहलुओं को उजागर किया है जो अब कुछ-कुछ धुंधला हो चुका है…..

पहला अंश

राजनीतिक नज़रिए से इसमें दो बातें अहम थीं: पहली, बीजेपी के मौजूदा नेतृत्व के आडवाणी और जोशी से आजकल रिश्ते ठीक नहीं है और बहुत से बीजेपी नेताओं को मैंने आडवाणी से मुलाक़ात करने से बचते देखा है. मुझे याद आता है कि जब वे संसद में लोकसभा के सदन से निकल कर अपने कमरे तक जाते तो उनके साथ पच्चीस-तीस सांसद कमरे तक छोड़ने आया करते थे. लेकिन ये उन दिनों की बात है जब आडवाणी की पार्टी और सरकार, दोनों में तूती बोलती थी. आजकल ऐसा नहीं होता. एक रोज़ बजट सत्र के दौरान रिपोर्टिंग के लिए मैं संसद भवन में था. देखा कि आडवाणी सदन से बाहर निकले हैं, अकेले ही.
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मैंने नमस्कार किया और उनसे उनके स्वास्थ्य के बार में पूछा. जवाब मिला ‘आजकल स्वास्थ्य ही तो बस अच्छा है’ इस बीच मैंने देखा कि केंद्र सरकार के एक मंत्री क़रीब पचास कदम की दूरी पर सामने से चले आ रहे थे. उनकी नज़र शायद अचानक आडवाणी जी पर पड़ी और वे तुरंत ही मुड़ कर लौट गये. मैंने देख लिया था, आडवाणी जी की नज़र नहीं पड़ी थी. ये मंत्री जी एक ज़माने तक आडवाणी जी तो दूर, उनकी पत्नी कमला जी और बेटी प्रतिभा के दर्शन करके भी धन्य हो जाते . सार्वजनिक तौर पर कमला जी के चरण स्पर्श करना और कई निजी कार्यक्रमों का आयोजन करना ही उनका सबसे पहला काम हुआ करता. वक़्त के साथ लोगों के बदलने की ये कहानी बड़ी पुरानी है.

दूसरा अंश

महंत अवेद्यनाथ ने श्री रामजन्म भूमि पर मंदिर निर्माण के लिए शिलान्यास कार्यक्रम की घोषणा कर रखी थी. 9 नवम्बर 1989 को एक बजकर तैतीस मिनट पर गर्भगहृ से 192 फ़ीट दूर पूर्व निर्धारित स्थान पर हवन और भूमि पूजन के बाद शिलान्यास के लिए पहली शिला दक्षिण बिहार के कामेश्वर प्रसाद चौपाल से रखवाई गयी थी. कामेश्वर प्रसाद को हिंदू समाज में अछूत माने जाने वाले समाज का माना जाता था. शिलान्यास के बाद महंत अवैद्यनाथ ने कहा कि यह श्रीराम मंदिर का ही नहीं, हिंदू राष्ट्र के सिहं द्वार का शिलान्यास हुआ है. अयोध्या में हर तरफ श्रीराम के जयकार से नारे लग रहे थे. कांग्रेस को लग रहा था कि अब हिंदू वोट उनके साथ हो जायेगा. दूसरी तरफ बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को राजनीतिक ज़मीन मज़बूत करने के लिए रामजन्मभूमि आंदोलन बेहतर रास्ता महसूस होने लगा था.




शिलान्यास के बाद श्री रामजन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति ने पूर देश में जनजागरण अभियान की शरुआत कर दी थी. महंत अवैद्यनाथ ने ऐलान कर दिया था कि हर हाल में 30 अक्टूबर 1990 को मंदिर निर्माण का कार्य शरू हो जायेगा. युवकों का बलिदानी जत्था अयोध्या जायेगा और रोकने पर अहिंसक गिरफ़्तारी दी जायेगी और यदि प्रशासन ने गोली चलाई तो हम कुर्बानी देंगे.

उन्होंने कहा कि हम जेल जाने को तैयार हैं, गोलिया खाने को तैयार हैं. महंत अवैद्यनाथ ने कहा, ‘वहा पर मंदिर पहले से ही है, हम उसका जीर्णोद्धार करगें.’ बीजेपी ने लोगों को जोड़ने और आगे लाने के साथ प्रचार-प्रसार का काम करने की ज़िम्मेदारी ले ली. उसी वक़्त एकात्मकता यात्रा निकालने का फ़ैसला हुआ, जो चारों दिशाओ से शुरू होनी थी. इस यात्रा को वाजपेयी को जम्मू से,असम में कामाख्या मन्दिर से राजमाता विजया राजे सिन्धिया को, मुम्बई से सिकन्दर बख़्त को और कन्याकुमारी से आडवाणी को शरू करना था. इसकी तैयारी के लिए बातचीत शरू हुई तो वह बहुत निराशाजनक रही. राजमाता सिंधिया ने स्वास्थ्य ख़राब होने का हवाला दते हुए ख़ुद को इस यात्रा से अलग कर लिया तो सिकन्दर बख़्त ने कहा, ‘यार, मझे कौन सुनने आयेगा?’ और इस तरह वे यात्रा से अलग हो गये. वाजपेयी ने कहा, ‘मैं नौटंकी में विश्वास नहीं करता.’ लेकिन आडवाणी ने मन बना लिया था. उन्होंने कहा कि वे सोमनाथ से यात्रा शरू करेंगे. आडवाणी इसके पीछे राजनीतिक हिसाब–किताब दख रहे थे. उसके राजनीतिक मायने भी होंगे, क्योंकि देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने सोमनाथ मन्दिर का पनुर्निर्माण करवाया था. आडवाणी को लगा कि इससे दोनों मकसद पूरे होंगे- राम मन्दिर निर्माण पर सवाल खड़े करने वालों को जवाब दिया जा सकेगा और पार्टी को राजनीतिक मज़बूती भी मिलेगी. प्रमोद महाजन को इसकी व्यवस्थाओं की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी और गरुमूर्ति ने पूरी यात्रा को स्वरूप देने में मदद की.
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जून 1990 में ही रथयात्रा के बारे में फ़ैसला हो गया था और वी. पी. सिहं ने मंडल आयोग की रिपोर्ट अगस्त में लागू करने का ऐलान किया. बहुत से लोग समझते हैं कि मंडल कमीशन की रिपोर्ट के जवाब में रथयात्रा को शरू किया गया. रथयात्रा के लखनऊ पहुचनें पर वाजपेयी द्वारा उसके स्वागत करने का कार्यक्रम बनाया गया तो उसके लिए वाजपेयी तैयार नहीं हुए. फिर बड़ी माथापच्ची के बाद ही वे तैयार हुए.

विश्व हिंदू परिषद के कारसेवा शरू करने के कार्यक्रम को लेकर दश भर में बड़ा उत्साह दिखाई देने लगा था. गावों और शहरों से जत्थों में लोग आने की योजना बना रहे थे. बहुत से लोग अपने -अपने इलाकों से अयोध्या पहुचनें की तैयारी करने लगे. इस वक़्त लालकृष्ण आडवाणी इस कारसेवा में बीजेपी और ख़ुद की भागीदारी बनाने के बारे में सोच रहे थे. एक शाम उन्होंने अपनी धर्मपत्नी कमला के साथ इस मुद्दे पर चर्चा की और बताया कि वे राम मंदिर निर्माण को लेकर पदयात्रा पर निकलना चाहते हैं. इतनी ही देर में बीजेपी के महासचिव प्रमोद महाजन आडवाणी के पास उनके घर पहुचें. आडवाणी ने कहा कि मैं राम मंदिर मुद्दे पर पदयात्रा निकालना चाहता हूं और इसे पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर 25 सितंबर से या फिर दो अक्टूबर को गांधी जयंती से शरू करना चाहता हूं. महाजन का कहना था कि पदयात्रा से ज़्यादा इलाकों तक नहीं पहुंचा जा सकता और तब महाजन ने ही आडवाणी को रथयात्रा पर निकलने का सुझाव दिया और ख़ुद इसे तैयार करने की ज़िम्मेदारी भी ली. दस हज़ार किलोमीटर की लंबी इस यात्रा का नाम भी महाजन ने ही दिया—राम रथयात्रा.



रथयात्रा 25 सितम्बर को सोमनाथ से शरू होकर 30 अक्टूबर को अयोध्या में ख़त्म होनी थी. वाजपेयी रथयात्रा निकालने के पक्ष में नहीं थे लेकिन उन्होंने दिल्ली में इसे हरी झण्डी दिखाई. रथयात्रा को लेकर जनता दल सरकार और बीजेपी के बीच तनाव बढ़ने लगा था. आडवाणी की गिरफ़्तारी के हालात बन गये थे. जनता दल सरकार ने इसका अंदेशा भी जता दिया था. बीजेपी ने अपनी दिल्ली में हुई बैठक में इस पर विचार भी किया और तय किया कि यदि आडवाणी की गिरफ़्तारी होती है तो बीजेपी वी. पी. सिहं सरकार से समर्थन वापस ले लेगी. 23 अक्टूबर को बिहार में जनता दल सरकार के मुख्यमंत्री लालू यादव ने आडवाणी को समस्तीपुर में गिरफ़्तार कर लिया और उन्हें बिहार-बंगाल की सीमा पर दुमका के पास एक गेस्ट हाउस में रखा गया. दिलचस्प है कि आडवाणी की गिरफ़्तारी के लिए समस्तीपुर के अफ़सर आरके सिंह को ज़िम्मेदारी सौंपी गयी थी. आर.के. सिंह 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी में शामिल हो गये और सांसद बने, फिर मंत्री भी बन गये.




रथयात्रा में आडवाणी को पहले धनबाद में गिरफ़्तार किया जाना था. बाद में उनकी गिरफ़्तारी समस्तीपुर में होना तय हुआ. आडवाणी की गिरफ़्तार के बाद सरकार से बीजेपी की समर्थन वापसी को लेकर भी वाजपेयी इसके पक्ष में नहीं थे. आडवाणी को पांच सप्ताह तक वहां रखने के बाद रिहा किया गया, लेकिन तब तक वीपी सिंह सरकार के लिए बहुत देर हो चुकी थी.

लंबे समय तक बीजेपी के महासचिव और आडवाणी के सबसे विश्वस्त रहे गोविन्दाचार्य की बात मानें तो विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार में ही मंदिर मुद्दा क़रीब-क़रीब सुलझने के दरवाज़े तक पहुच गया था. वीपी सिंह ने इसके लिए एक प्रस्ताव रखा कि इस मुद्दे पर राजनीतिक दल ख़ुद को दूर रखें और दोनों समुदायों से गैर-राजनीतिक लोगों को साथ लेकर इसका हल निकालने की कोशिश की जाये. वीपी सिंह का प्रस्ताव था कि विवादित ढाचा और स्थान एक नये हिंदू ट्रस्ट को इस शर्त के साथ सौंप दिया जाये कि वह विवादित ढाचें में छेड़छाड़ किए बिना राम मंदिर का निर्माण कर और मंदिर और विवादित ढांचे के बीच एक दीवार बनाई जाये. सिंह ने इसकी ज़िम्मेदारी तब आन्ध्रप्रदेश के राज्यपाल कृष्णकान्त को सौंपी कि वे इसके लिए समर्थन जुटाने का काम करें. कृष्णकान्त ने तब कांची कामकोटि पीठ के स्वामी जयेन्द्र सरस्वती को नये ट्रस्ट का मुखिया बनाने का सझाव दिया. कृष्णकान्त ने मन्दिर विवाद के मख्य याचिकाकर्ता अली मिया और जयेन्द्र सरस्वती के बीच बातचीत भी कराई. साथ ही विश्वेश तीर्थ स्वामी के साथ भी सलाह मशविरा किया. दूसरी तरफ प्रधानमंत्री ने संघ समर्थक एस. गरुमूर्ति को इस बातचीत का मध्यस्थ बनाया था. प्रधानमंत्री ने गरुमूर्ति से रास्ता निकालने को कहा तो गरुमूर्ति ने उन्हें तीन सूत्री फ़ॉर्मूला दिया. इसके तीन दिन बाद प्रधानमंत्री के दूत के तौर पर दो वरिष्ठ मन्त्रियों जॉर्ज फर्नांडिस और पी. उपेन्द्र से दिल्ली में मुलाक़ात की और बताया कि केन्द्र सरकार राम मंदिर मुद्दे पर अध्यादश लाने को तैयार है.




उसी शाम प्रधानमंत्री ने गोविन्दाचार्य और उस वक़्त अतिरिक्त सॉलीसिटर जनरल रहे अरुण जेटली को बुला कर तीन सूत्री फ़ॉर्मूले को स्वीकार करने की बात की. उस पूरी रात सरकार ने इस पर काम करके अध्यादेश तैयार कर भी लिया. इस सिलसिले में वीपी सिंह ने आडवाणी से भी बात कर ली, लेकिन शाम होते- होते बात पूरी तरह बदल गयी. शाम को प्रधानमंत्री निवास पर एक बैठक में गरुमूर्ति और अरुण जेटली को भी बुलाया गया. इस बैठक में प्रधानमंत्री के अलावा चारमंत्री जॉर्ज फर्नांडिस, अरुण नेहरू, अजीत सिंह और कानून मंत्री दिनेश गोस्वामी शामिल थे. गोस्वामी ने कहा कि सरकार अध्यादेश जारी नहीं कर सकती.

केंद्र सरकार ने अध्यादश के साथ यह शर्त रखी कि विश्व हिंदू परिषद बाकी दो मन्दिर यानी मथुरा और काशी के मुद्दों को छोड़ दे. मुस्लिम पक्ष मंदिर निर्माण के लिए तैयार हो गया था, लेकिन बाद में वीचएपी ने अपने कदम पीछे हटा लिए और वह काशी, मथुरा दोनों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुई तो फिर अध्यादेश जारी करने का फ़ैसला भी वापस ले लिया गया. उस समय परिषद कार्यकर्ता नारे लगाते थे, ‘अयोध्या तो झांकी है, काशी, मथुरा बाकी है.’




लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ़्तार से पहले ही दिल्ली में 17 अक्टूबर को हुई बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में सरकार को चेतावनी दी गयी कि अगर रथयात्रा को रोकने की कोशिश की गयी तो बीजेपी सरकार से समर्थन वापस ले लेगी. उस बैठक में वाजपेयी ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उनके क़रीबी मित्र अप्पा घटाटे कुछ बोलना चाहते थे तो प्रमोद महाजन ने पूछा, ‘आप समर्थन कर रहे हैं या नहीं?’ वाजपेयी ने घटाटे का साथ देते हुए कहा कि उन्हें बोलने तो दो. घटाटे ने पूछा कि रथयात्रा बिहार और यूपी के बाद पश्चिम बंगाल जायेगी और अगर उन्होंने गिरफ़्तार किया तो क्या हम समर्थन वापस ले लेंगे?

बैठक में वाजपेयी ने समर्थन वापस लेने के फ़ैसले का साथ नहीं दिया था. वाजपेयी सिंह सरकार को कुछ और वक़्त देना चाहते थे. लेकिन वाजपेयी फिर अकेले पड़ गये. 23 अक्टूबर को आडवाणी के रथ को रोककर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया तो वाजपेयी की अगवाई में एक प्रतिनिधिमण्डल राष्ट्रपति आर वेंकटरामन से मिला और सरकार से समर्थन वापसी की चिट्ठी उन्हें सौंप दी. सिंह सरकार अल्पमत में आ गयी लेकिन प्रधानमंत्री ने लोकसभा में विश्वास मत हासिल करने का दावा किया ताकि संसद के माध्यम से वह देश को अपनी बातें कह सकें.




उधर रामरथयात्रा पर जब आडवाणी को लेकर जनता दल सरकार में चर्चा होने लगी तो प्रधानमंत्री वीपी सिहं आडवाणी की गिरफ़्तारी के पक्ष में नहीं थे और लालू यादव भी थोड़ा हिचकिचा रहे थे. लेकिन शरद यादव का दबाव था कि आडवाणी को गिरफ़्तार किया जाना चाहिए. बीजेपी ने पहले ही साफ़ कर दिया था कि अगर आडवाणी की गिरफ़्तारी होगी तो वह समर्थन वापस ले लेगी. इसके बावजूद शरद यादव का आडवाणी को गिरफ़्तार करने के लिए दबाव बना रहा.

रामरथयात्रा के वक़्त वाजपेयी ने जब आडवाणी को हरी झण्डी दिखाई तो कार्यकर्ता नारे लगा रहे थे कि आडवाणी तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं. उस पर वाजपेयी ने कहा, ‘अयोध्या वो जगह है जहां ना युद्ध होता है और न ही योद्धा. आडवाणी जी वहां यात्रा पर जा रहे हैं, लड़ाई लड़ने नहीं.’




दूसरी तरफ बिहार में आडवाणी को गिरफ़्तार कर लालू हीरो हो गये तो यूपी में जनता दल के एक और मख्यमंत्री मुलायम सिंह ने किसी भी हाल में 30 अक्टूबर को कार सेवा नहीं होने देने का ऐलान कर दिया. जनता दल के दो नेताओं और मुख्यमंत्रियों लालू यादव और मुलायम सिंह यादव के बीच होड़ यह दिखाने की लगी थी कि कौन ज़्यादा सेक्युलर है और इसलिए जब लालू यादव ने आडवाणी को बिहार में ही गिरफ़्तार कर लिया तो फिर मुलायम सिंह के पास कारसेवकों के ख़िलाफ़ कड़ा रवैया अपनाने के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचा था.

कांग्रेस के ख़िलाफ़ हो रहे आम चुनाव में बीजेपी ने विश्वनाथ प्रताप सिंह के जनता दल के साथ जाने का फ़ैसला कर लिया था, इसलिए बीजेपी के घोषणापत्र में जन्मभूमि पर मन्दिर निर्माण का मामला नहीं रखा गया.लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान उसका ख़ूब इस्तेमाल किया गया और उसके लिए सर ऊंचे कर दिये गये. दूसरी तरफ कांग्रेस भी इस मुद्दे को भुनाना चाहती थी. हिंदू कार्ड खेलने के लिए कांग्रेस सरकार ने विश्व हिंदू परिषद के साथ हाथ मिला लिए और गृह मंत्री बूटा सिंह और उत्तर प्रदेश के मख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने मंदिर के लिए शिलान्यास की इजाज़त दे दी. 9 नवम्बर को वैदिक परंपरा के साथ शिलान्यास समारोह शुरू हुआ और 10 नवम्बर को शिलान्यास हो गया. इस मौके पर महंत अवैद्यनाथ ने कहा, ‘यह सिर्फ़ राम मन्दिर का शिलान्यास नहीं है, बल्कि यह हिंदू राष्ट्र और हिन्दू समाज की एकता के लिए शिलान्यास है.’




(यह लेख विजय त्रिवेदी की किताब ‘यदा यदा हि योगी’ का अंश है , जो प्रकाशक की अनुमति से प्रकाशित किया जा रहा हैं. विजय त्रिवेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं. इस पुस्तक का प्रकाशन वेस्टलैंड बुक ने किया है.)

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