"एक हैं हम" (तू...दरार ना पैदा कर...) :- डॉ प्रियंका "हम है ना"

💐🇮🇳💐जय भारत💐🇮🇳💐🙏🙏🙏साथियों🙏🙏🙏💐🇮🇳💐

""ब्रम्हाण्ड है अपना परिवार...
मानवीय गुण रहे...
ना रहे कोई विकार...
"सम्पूर्ण राष्ट्र" करे ;
"भारत" का नमन स्वीकार...।।""

"सम्पूर्ण राष्ट्रों" को...अंतःकरण की असीम गहराईयों से "भारत" नमन करता है...।
  💐🙏🇮🇳🌏🇮🇳🙏💐

            "एक हैं हम"
(तू...दरार ना पैदा कर...)


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हम "भारत की जड़ें" हैं...
हम सब एक है...
शायद तुझे एहसास नहीं...
आवाम के अमन-चैन में कोई ख़लल डाले...
ये आवाम को हरगिज़ बर्दाश्त नहीं...।।



ठोकरों नें हमें सिखाया है...
कौन अपना है;कौन पराया है...
तूनें तो भ्रम का जाल बिछाया है...
पर विश्वास को;विश्वास ही भाया है...
विश्वासघात हमें स्वीकार नहीं...।।


हम "भारत की जड़ें" हैं...
हम सब एक हैं...
शायद तुझे एहसास नहीं...
आवाम के अमन-चैन में कोई ख़लल डाले...
ये आवाम को हरगिज़ बर्दाश्त नहीं...।।

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"भारत" से जन-जन का नाता है...
तू नहीं हम सबका भाग्यविधाता है...
जीना हम सबको ख़ुद के दम पर आता है...
"संयम-संतुलन" संग चलना हमको आता है...
असंतुलन हमें स्वीकार नहीं...।।


हम "भारत की जड़ें" हैं...
हम सब एक हैं...
शायद तुझे एहसास नहीं...
आवाम के अमन-चैन में कोई ख़लल डाले...
ये आवाम को हरगिज़ बर्दाश्त नहीं...।।


"भारत की माटी" का तिलक हमनें...
अपनें माथे पर सजाया है...
संघर्ष में पीठ नहीं दिखाया है...
कर्मठता को जीवन में अपनाया है...
अकर्मण्यता हमें स्वीकार नहीं...।।



हम "भारत की जड़ें" हैं...
हम सब एक हैं...
शायद तुझे एहसास नहीं...
आवाम के अमन-चैन में कोई ख़लल डाले...
ये आवाम को हरगिज़ बर्दाश्त नहीं...।।


आवाज़ हमारी दबाई जाती रही...पर;
अन्याय के आगे हमनें शीश नहीं झुकाया है...
दिलों में प्यार का दीप जलाया है...
इंसां को इंसां से जोड़ना ही हमको आया है...
दिलों के दरार हमें स्वीकार नहीं...।।


हम "भारत की जड़ें" हैं...
हम सब एक हैं...
शायद तुझे एहसास नहीं...
आवाम के अमन-चैन में कोई ख़लल डाले...
ये आवाम को हरगिज़ बर्दाश्त नहीं...।।

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आवाम की मज़बूती ही,"भारत की ताक़त" है...
आवाम को कमज़ोर ना समझना तू...
धूल चटा देगी अर्श से फर्श का...
आवाम में इतनी हिम्मत है...
मानसिक ग़ुलामी हमें स्वीकार नहीं...।।


हम "भारत की जड़ें" हैं...
हम सब एक हैं...
शायद तुझे एहसास नहीं...
आवाम के अमन-चैन में कोई ख़लल डाले...
ये आवाम को हरगिज़ बर्दाश्त नहीं...।।


हम बस मानवता का अलख जगाते हैं...
विशुद्ध प्रेम की धारा के सिवा; हमको कुछ स्वीकार नहीं...
विशुद्ध प्रेम की धारा के सिवा; हमको कुछ स्वीकार नहीं...
विशुद्ध प्रेम की धारा के सिवा; हमको कुछ स्वीकार नहीं...

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""अब कुछ भी नहीं सोचना बाकी है...
अब तो सबकुछ ख़ुद करनें की बारी है...
चल अब तू पूरी तैयारी करले...
मेरी तो पुरज़ोर तैयारी है...।।""


""पथ थोड़ा उबड़-खाबड़ है...
पर; गति भी अपनीं दुगनीं है...
मुश्किलें बढायेगीं वेग मेरा...
पर;चाल नहीं अब रुकनीं है...।।""


""चल; चाल-चालाकियाँ-चतुराई संग..."नहले पे दहला" देते हुए...सही दिशा में बढ़ चलें..."विजय" सुनिश्चित है...""

आ...अब...सभी मिलकर चलें...विश्वपटल की ओर...
🇮🇳🌏🇮🇳🌏🇮🇳🌏🇮🇳🌏🇮🇳
      आपके परिवार की
      अपनी बेटी-
        डॉ.प्रियंका"हम हैं ना"
             9450182942
         सक्रिय समूह भारत
   🌈🔥जागृत भारत🔥🌈
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